उत्तर प्रदेश की चिकनकारी (Chikankari of Uttar Pradesh in Hindi)

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 चिकनकारी (Chikankari)

तहज़ीब और नज़ाकत के जमीन लखनऊ से, चिकनकारी एक नाजुक और जटिल कढ़ाई शैली है। जिसे माना जाता है की मुगल बादशाह जहाँगीर की पत्नी नूरजहाँ द्वारा लाया गया था।

चीकन, का शाब्दिक अर्थ ‘कढ़ाई’ (Embroidery) है। ये पारंपरिक कढ़ाई शैली लखनऊ की सबसे प्राचीन और मुगलों द्वारा शुरू की जाने वाली बेहतरीन कला है। इस कला को पूर्व तीसरी शताब्दी में पाया गया था।

इस व्यवसाय (बिज़नेस) का ज़्यादातर हिस्सा पुराने लखनऊ के चौक इलाके में फैला हुआ है। यहां के बाज़ार चिकन कशीदाकारी (Embroidery) के दुकानों से भरे हुए हैं। मुर्रे, जाली, बखिया, टेप्ची, टप्पा आदि 37 प्रकार के चिकनकारी के प्रकार होते हैं। 

पहले की चिकनकारी में सिर्फ सफेद कपड़ो के ऊपर सफेद कढ़ाई ही होती थी लेकिन अब हर तरह के कपड़ो पे हर कलर की कढ़ाई होतीहै। चिकनकारी की खासियत ये है कि सिंपल खूबसूरत डिज़ाइन पहने वालो को रिच लुक देती है और affordable प्राइस में मिल जाती है।

चिकनकारी सिर्फ भारत में ही नही बल्कि दुनिया भर में इसने अपनी छाप छोड़ी है। चिकनकारी का एक खूबसूरत आर्ट पीस लंदन के रायल अल्बर्ट म्यूजियम में भी रखा गया है।

उत्पत्ति और इतिहास (Origin and History)

भारत मे चिकनकारी की शुरुआत तो तीसरी शताब्दी में ही हो चुकी थी, लेकिन इसको ले के एक और कहानी है कि एक यात्री जिसने पानी पीने के बदले में किसान को चीकनकारी सिखाया था।

हालांकि, दूसरी और सबसे लोकप्रिय तथ्यात्मक रूप से जांच योग्य कहानी ये है की मुगल सम्राट जहांगीर की पत्नी नूरजहाँ ने इसकी शुरुआत की थी। माना जाता है कि वो खुद एक प्रतिभाशाली कशीदाकारी थी, और इस कला के लिए एक विशेष शौक था।

मुगल साम्राज्य के पतन के बाद, चिकनकारी कारीगर पूरे भारत में फैल गए, लेकिन लखनऊ मुख्य केंद्र बना रहा।

चिकनकारी की प्रक्रिया (Process of Chikankari)

  • लखनऊ चिकनकारी तकनीक दो भागों में टूट सकता है – पूर्व और बाद की तैयारी चरण।
  • पूर्व-कार्य में निर्धारण शामिल है डिजाइन को लकड़ी के ब्लॉक पे उतारना।
  • जिसके बाद इन टिकटों (stamps) का उपयोग किया जाता है। ब्लॉक प्रिंटिंग (stamp प्रिंटिंग) पर नील और वाइट डाई की मदद से डिज़ाइन को कपड़े पर छाप दिया जाता है।
  • फिर कढ़ाई प्रक्रिया आती है, जहां कपड़े सेट किए जाते है एक छोटे फ्रेम में, और सुईवर्क का काम करना सुरु होता है।
  • प्रयुक्त सिलाई का प्रकार मोटिफ के आकार पर निर्भर करता है।
  • तैयार परिधान (Apparel) को पहले स्थिरता के लिए जांचा जाता है और नीरसता (Dullness), और फिर स्याही के सभी निशान हटाने के लिए धोया जाता है।

रंग (Colours)

पहले चिकनकारी एक सफेद पर सफेद कढ़ाई के रूप में ही जाना जाता था, लेकिन बदलते फैशन ट्रेंड के साथ चिकनकारी का भी रूप बदल चुका है। अब चिकनकारी का काम हर तरह के कपड़े पर होता है और हर कलर के धागे से कढ़ाई की जाती है।

रूपांकनों (Motifs)

फ्लोरल पैटर्न तो हर जगह चलते है इसके प्रसिद्ध होने के कारण, फ्लोरल पैटर्न हमेशा से प्रधान रहे हैं। डिजाइन को पूरा करने के लिए तने, बूटी और पत्तियों को जोड़ा जाता है। अन्य मोटिफ्स में मुकेश, कामदानी, बिल्ला जैसे अलंकरण शामिल हैं साथ ही सेक्विन, मनका और मिरर का भी काम सामिल हैं, जो सरल काम में एक रिच लुक देते है।

Stitches

चिकनकारी के कम से कम 40 अलग-अलग टाँके (stitches) प्रलेखित हैं, जिनमें से लगभग 30 है जो आज भी अभ्यास किए जाते है और जिनमे से कुछ मुख्य है- फ्लैट, उठे हुए और उभरे (raised and embossed) हुए टाँके, और जाली का काम।

चिकनकारी के काम में आने वाले कुछ स्टीटचेस में शामिल हैं: तापीची, पेन्ची, पश्नी, बखिया (उल्टा बखिया और सिधी बखिया), गिट्टी, जंजीरा, मुर्री, फंदा, जालियाँ आदि।

अंग्रेजी में: चेन स्टिच, बटनहोल स्टिच, फ्रेंच नॉट्स और रनिंग स्टिच, शैडो वर्क, और खाटू है (जिसे खटवा या कटाव) भी कहा जाता है।

Type of Stitches

Flat Stitches

  • Bakhiya

  • Ulti Bakhiya

  • Chana Patti

  • Badla

 

  • Rahet
  • Khatau

Embossed/ Raised Stitches

  • Ghas Patti

 

  • Dhum Patti
  • Phanda

  • Murri

Keel Kangan

Tepchi

 

Jaali

Hool

उत्पाद (Products)

chikankari of Uttar Pradesh

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